गुत्थी

नमस्कार,

Regardless

मेरे मानस पटल पर एक प्रसंग की छाप इस कदर गहरी है कि भुलाये नहीं भूलती. एक या दो वर्ष पूर्व की बात है, मैं गृहनगर गया हुआ था छुट्टियाँ मनाने. इसी दौरान मेरी ही हम-उम्र का मेरा एक फुफेरा भाई आ गया अपनी पत्नी और लगभग दो-ढाई साल के एक पुत्र के साथ. हमउम्र होने के कारण हम दोनों भाइयों में मित्रभाव सा सम्बन्ध था. वे लोग हमारे यहाँ दो दिन रुके थे. मैं यदा-कदा बच्चे के साथ खेला करता था. अन्य बालकों की तरह वह बालक भी बड़ा नटखट था. लेकिन, यहाँ यह कहना मिथ्या होगी कि इतनी जल्दी हम दोनों एक दुसरे से पूरी तरह हिलमिल गए थे. अन्य बालकों के समान वह बालक भी दूध पीने में अपनी माँ को सताया करता था या यूँ कहें कि माँ को छटी का दूध याद दिला देता था.

वह फिर नहीं माना जब एक रात सोने से पहले उसकी माँ ने दूध पिलाने के लिए उसे डांटने, पुचकारने और उसके पीछे पीछे भागने लगी. अंत में वह हतास हो गयी और उन्हें इस बात की चिंता सताने लगी कि अगर दूध नहीं पिया तो उसके बच्चे का विकास अच्छी तरह से नहीं हो पायेगा और ना जाने क्या-क्या जो केवल एक माँ का ह्रदय ही जान और समझ सकता है. तभी किसी ने कहा है कि जननी जन्मभूमि स्वर्गादपि गरीयसी! माँ कि यह अवस्था देख कर सहसा ही मेरा मन मातृभाव के प्रति नतमस्तक और उस ममता कि मूर्ति को दुखी देख दुखित हो गया. मैंने तत्काल ही अपनी उम्र का त्याग कर स्वयं को  बाल्यावस्था में ढालने का सफल प्रयास किया. मैंने अपनी बालसुलभ परन्तु उस अबोध व हठी बालक के लिए पूर्णतः अनजान युक्ति से उसे सहस ही दूध पीने के लिए उत्साहित कर दिया. उसने धीरे धीरे हि सही पर पूरा गिलास दूध पी गया. इस कृत्य की मैंने प्रातः काल भी पुनरावृत्ति की. यह देख उसकी माता ने आश्चर्यपुल्कित हो मुझसे कहा कि “पूरे गिलास का दूध तो इसने आज तक मेरे हाथ या घर में किसी से भी कभी नहीं पीया है. यह आश्चर्य कि बात है कि यह आप के हाथों से पूरा गिलास दूध पी गया. इसने तनिक भी ना-नुकुर नहीं की जबकि आप इससे पहली बार मिले हो.” प्रतिउत्तर में मैंने उनसे बस इतना कहा कि बच्चे के साथ बच्चा बनना पड़ता है. उस घटना की याद और एहसास अब तक मेरे जेहन में घर की हुई है. माता के उस वाक्य ने उसी क्षण दो विपरीत भावों को लगभग एक साथ मेरे अंतर्मन में जन्म दिया.

क्या आप बता सकते हैं कि एक समय में वे कौन से दो विपरीत भावो ने जन्म लिया होगा?

अभिवादन,

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